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चिरगाँव का इतिहास


मैथिलीशरण गुप्त (१८८५ - १९६४ ) खड़ी बोली के प्रथम महत्वपूर्ण कवि

श्री पं महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की प्रेरणा से आपने खड़ी बोली को अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया और अपनी कविता के द्वारा खड़ी बोली को एक काव्य-भाषा के रूप में निर्मित करने में अथक प्रयास किया और इस तरह ब्रजभाषा-जैसी समृद्ध काव्य-भाषा को छोड़कर समय और संदर्भों के अनुकूल होने के कारण नये कवियों ने इसे ही अपनी काव्य-अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। हिन्दी कविता के इतिहास में गुप्त जी का यह सबसे बड़ा योगदान है।

पवित्रता, नैतिकता और परंपरागत मानवीय सम्बन्धों की रक्षा गुप्त जी के काव्य के प्रथम गुण हैं, जो पंचवटी से लेकर जयद्रथ वध, यशोधरा और साकेत तक में प्रतिष्ठित एवं प्रतिफलित हुए हैं। साकेत उनकी रचना का सवोर्च्च शिखर है।

अपनी लेखनी के माध्यम से वह सदा अमर रहेंगे और आने वाली सदियों में नए कवियों के लिए प्रेरणा का स्रोत होंगे।




राव मूरत सिंह जू देव (दाऊ साहब) (आजादी के बाद चिरगांव के प्रथम राजा दाऊ साहब की नगरी)

चिरगांव झाँसी जिले में स्थित चिरगाँव एक ओर साहित्यिक दृष्टि से जनमानव के हृदय में एक तीर्थ स्थली के रूप में विद्यमान है। वहीं दूसरी ओर अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सन 1525 ई0 में ओरछा नरेश महाराज राव सिंह जू देव के सुपुत्र कुँवर हुकुम सिंह जू देव ने चिरगांव नगर बसाया गया। तीन सौ वर्षों तक यह बुन्देलों की राजधानी रही।

चिरगांव रियासत की स्थापना सन 1556 ई0 में हुई थी। इस क्षेत्र के निकट स्थान को पहले औपरा के नाम से जाना जाता था। औपारा उस समय एक नगर था तथा इसके बारे में यहाँ तक कहा जाता था कि यहाँ बारह घडि़यालें बजती थी। सन 1556 ई0 में चिरगाँव का किला राव मोहक सिंह जू देव ने बनवाया और 28 गाँवों की एक रियासत बना ली थी। पहले वह ओरछा राज्य के अधीन रहा, परन्तु ओरछा राज्य वर्तमान में टीकमगढ़ के दरबार में चिरगाँव के राव की प्रथम कुर्सी थी।

सन 1842 ई0 में चिरगांव ब्रिटिश शासन के अन्र्तगत आ गया। चिरगांव के महाराज श्री राव बख्त सिंह जू देव के पौत्र श्री राव रघुनाथ सिंह जू देव के कोई सन्तान नहीं थी। अतः वह निःसन्तान मर गये। तब राजमाता लड़ई दुलइया के रिश्तेदार ठाकुर श्री विक्रमजीत सिंह जू देव के यहाँ 4 जनवरी 1904 में जन्में पुत्र कुँवर राव मूरत सिंह जू देव को बुलाकर सन 1990 ई0 में गोद लिया। तथा 6 वर्ष की अवस्था में गद्दी पर बैठा दिया।

श्री राव मूरत सिंह जू देव की प्रारम्भिक शिक्षा चिरगांव में ही हुई। मिडिल पास करके यहाँ सन 1923 ई0 में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिये मैक्डोनल हाईस्कूल, झाँसी, जिसे आज बिपिन बिहारी इण्टर कालेज, झाँसी के नाम से जाना जाता है, में भर्ती कराया गया। ये शिकार के बडे़ शौकीन थे।